मोहब्बत या सरदर्द

 सुधा ने सुनहरे गोटे वाली लाल साड़ी पहनी थी वह चेहरे पर साँझ सी गुलाबी मुस्कान लिए और हाथ में कुछ कागज़ लिए नज़दीकी चिकित्सालय से घर जा रही थी। उसके क़दम मानो हवा में तैर रहे हों ,माथे पर एक छोटी सी काली बिंदी, हाथों में मेहंदी और तकरीबन कंधों तक हरे रंग की चूड़ियाँ पहने हुए थी।नि:संदेह ही वह बला की ख़ूबसूरत लग रही थी। बेख़याली में अपनें हाथों में रची मेहंदी के डिजाइन को निहारते हुए उसमें छुपा “रवि” का नाम देख कर उसकी आँखें टिमटिमाने लगी और चेहरे ने हल्की मुस्कान की दुशाला ओढ़ ली। 



रवि , सुधा का पति था, जिसे वो बेहद प्यार करती थी। रवि का साथ होना सुधा के लिए सर्दियों की गुनगुनी धूप के जैसा था। पर काम में व्यस्त रहने के कारण दोनों बस शाम में ही कुछ पल साथ बात कर के बिता पाते थे। सुबह फिर वही भाग - दौड़ वाली ज़िन्दगी। सुधा को कभी भी रवि की किसी भी बात का बुरा नहीं लगा, छोटी छोटी लड़ाईयाँ आख़िर किस घर में नहीं होती पर फिर सब धूप आते ही ओस के जैसे गायब।

सुधा और रवि के रिश्ते में जितनी गंभीरता और ज़िम्मेदारियाँ थी, उस से कई ज़ियादा चंचलता और हंसी ठिठोली भी थी। उस दिन सुधा सज सँवर के आई थी, शायद उसे रवि से कुछ कहना था सोच ही रही थी के वो ये ख़ुशख़बरी किस तरह सुनाए कि वो माँ बनने वाली है।

इन्हीं ख़्यालों के साथ सुधा कब घर पहुँच गई उसे पता ही नहीं चला। वो उसी हवा की रफ़्तार से रवि के पास जा पहुँची जो उसके अंतर्मन में हिलोरे कहा रही थी। रवि सोफ़े पर बैठा सुबह का अख़बार पढ़ रहा था जिसकी ख़बरें शाम होते होते ठंडी हो चुकी थी। सुधा, रवि को देख कर बस घर में आने वाले नए मेहमान की ख़बर देने ही वाली थी के 

रवि ने कहा - "सुनो! तुमसे कुछ कहना है"

 "हाँ कहिए न! " सुधा चहकते हुए बोली 

रवि - "देखो मुझे लगता है कि हम लोग जो शाम में तीन चार घण्टे बात कर के बर्बाद कर देते हैं मुझे वो नहीं पसंद , मैं चाहता हूँ कि हम इन सब बातों में वक़्त ज़ाया न करें।"

दरअसल रवि और सुधा ने एक दूसरे के साथ सात साल बिताने के बाद प्रेम विवाह किया था। रवि हर शाम सुधा की गली के चक्कर लगाया करता था। कई बार सुधा के पिता की नज़रों में भी आया और एक दिन पकड़े जाने पर सुधा का हाथ उसके पिता से माँग लिया। ये सब सुधा कि आँखों के आगे एक पलक झपकनें के अंतराल में आ कर चला गया मानो कोई सपना हो ।

रवि की बात सुन सुधा हक्की-बक्की रह गई, उसे तो वो चंद घंटे भी कम लगते थे जब वो एक दूसरे के दुःख सुख के भवीदार बनते। पूरे दिन में काम के बाद जब वो थक कर घर आती तो वो रवि का चेहरा ही तो था जो उसे जेष्ठ की दोपहर में भी छाँव का एहसास दिलाता था।

वो कुछ बोलती के उसके पहले उसका गला रुँध गया । कुछ देर मौन रही फिर जिस तरह वो चिड़ियों के फैलाए हुए गेहूँ के दाने समेटा करती थी उसी तरह मन ही मन ख़ुद को समेटा, और बोली - "और कुछ कहना हो जो तुम्हें बुरा लगता हो तो बताओ , मैं सुन रही हूँ रवि!"

इसपर रवि बोला "मोहब्बत सरदर्द न बने तो ही अच्छा है"

"सिरदर्द !" सुधा धीरे से बुदबुदाई और फिर वो किसी सोच में ग़ुम हो गई।

लड़कियाँ प्यार में अंधी हों न हों समर्पित ज़रूर रहती हैं। उन्हें आहुति देना आता है।कभी अपनी इच्छाओं की तो कभी अपनों की ख़ुशी के लिए अपने आत्मसम्मान की बली दे देना कोई बड़ी बात नहीं है उनके लिए। 




देखा होगा आपने उन्हें संजोते हुए जंग लगे रिश्तों को, निखारते हुए घर के हर कोने को। उन्हें आता है ढेर सारी चिंताएँ लिए भी अपनों के लिए मुस्कुराना। उन्हें समेटना भी आता है , बिखरी हुई चीनी हो या दाल या फिर रिश्ते सब वो अपने आँचल में समेट लेती हैं।

कुछ बर्बाद नहीं होने देती, चाहे रात की बासी रोटी को सुबह घी लगा के कुरकुरा कर लें या फिर टूटे रिश्तों में रफूँ कर उसे चलने लायक बना लें।


सुधा ने भी यही किया, वो आत्मविश्वास के साथ मुस्कुराई और बोली

 "सिरदर्द का क्या है जी, दोपहर में है और शाम तक ग़ायब। मोहब्बत तो कैंसर है कैंसर , मुझे ले कर ही जाएगी"।

 

इस बात पर रवि बच्चों की तरह खिलखिलाकर हँस दिया। उसे शायद ये अनुभव हो चुका था के रिश्ते समय और प्रेम दोनों के भूखे होते हैं। उसने बड़े प्यार से सुधा के मखमली हाथ अपने हाथों में लिए और उसे सोफे में बिठा कर ख़ुद उसके सामने घुटनों पर बैठ गया। और बड़े प्यार से उसकी गोद में अपने हाथ रख कर बोला। अब कहो तुम तब कुछ कह रही थी न !

सुधा ने वही गुलाबी मुस्कुराहट ओढ़े अस्पताल से मिली रिपोर्ट रवि को थमा दी। 

रिपोर्ट पढ़ते ही रवि मानो सातवें आसमान पर था , उसका बस चलता तो सारा घर सर पर उठा लेता। उसने सुधा को गले लगा लिया और फूट फूट कर रोने लगा। 

"सुधा! सुधा ! मेरी सुधी! मैं! मैं बाप ! ..." उसके मुँह से शब्द नहीं निकल रहे थे। सुधा ने प्यार से उसकी तरफ़ देखा और कहा " हाँ रवि हमारा बच्चा " 

ये कहते हुए वो रवि के आगोश में समा गई। 



जिस तरह बारिश की कुछ बूंदें पड़ने से धरती धुल जाती है वैसे ही सुधा के भोले मन का मैल भी रवि के आँसुओं ने साफ़ कर दिया था ।

और दोनों एक दूसरे में इतना खो गए के वो शाम रात में कब बदल गई दोनों को ख़बर न हुई । 


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