कलाकार की हत्या कला की हत्या है

"चौबर दे चेहरे उत्ते नूर दसदा नि 

एहदा अट्ठूगा जवानी चे जनाज़ा मिट्ठिये"



नूर, कहते हैं कि आपके किरदार का नूर आपके चेहरे पर चमकता है। ऐसा ही नूर था जो उठा तो जवानी में जनाज़ा साथ लेकर उठा। किसका था यह नूर? कौनसी ऐसी शय थी पंजाब में जो कैनेडा के ब्रैम्पटन से लेकर वैंकूवर तक..अमेरिका के ईस्ट कॉस्ट से लेकर वेस्ट कॉस्ट तक..ऑस्ट्रेलिया में सिडनी, मेलबर्न से लेकर मिडिल ईस्ट में कुवैत, दुबई तक...पेशावर से लेकर पटना तक रौशनी फैला रही थी। 

यह शय थी शुभदीप सिंह सिद्धू या कहिए सिद्धू मूसेवाला। पंजाब के मानसा शहर के पास एक छोटे से गाँव में जन्मा पला बढ़ा एक ऐसा रचनाकार, गायक और लेखक जो हिपहॉप की दुनिया में महज़ चार साल में अपना ख़ास मक़ाम बना गया। एक ऐसा गीतकार जो कहता था कि उसके गीत उसकी आस पास की दुनिया, उसका पिंड ( गाँव) और रोज़मर्रा की ज़िंदगी की नुमाइश करते हैं। 



एक कलाकार की मौत का सबसे बड़ा नुक़सान होता है कला को। ऐसा ही कुछ 29 मई को हुआ जब कुछ अज्ञात हमलावारों ने सिद्धू मूसेवाला की गोली मारकर हत्या कर दी गई। हिपहॉप की दुनिया ने अपना एक चमकता सितारा खो दिया। पंजाबी के महान शायर शिव कुमार बटालवी का एक गीत था,

"असाँ ते जोबन रुत्ते मरणा, जोबन रुत्ते जो कोई मरदा..फुल्ल बने ज्यां तारा, जोबन रुत्ते आशिक़ मरदे ज्यां कोई करमां वाला"। 

ठीक उसी तरह से 'एहदा उट्ठूगा जवानी चे जनाज़ा मिठिए' बोल सिद्दू के एक गाने 'द लास्ट राइड' के हैं जो आज वर्तमान को मुँह चिढ़ाते से मालूम पड़ते हैं। अफ़सोस, सद अफ़सोस कि शिव कुमार बटालवी साहब का जनाज़ा भी जवानी में ही उठा और सिद्धू का भी। 



बात करें सिर्फ़ शुभदीप सिंह सिद्धू की तो शुरुआती दौर चुनौतियों से भरा रहा। इसके बाद उसने ख़ुद ही उस समंदर में गोते लगाए और शब्दों के वो ताने बुने की देखते ही देखते दुनिया को दीवाना बना लिया। ख़ुद गाने लिखते, ख़ुद धुन बनाते, ख़ुद गाते और ख़ुद बेचते। 

आप सोचिए किसी होटल में लोग आपके गानों पर थिरक रहें हों और आप उस समय वहीं काम कर रहे हों। कुछ ऐसा ही वक़्त सिद्धू मूसेवाला ने भी देखा और देखते देखते उन्होंने अपना वक़्त इतना बदल दिया के उनके जाने के बाद भी सदियों तक लोग इस कलाकार को याद करते रहेंगे। 


 पंजाबी म्यूजिक की दुनिया में एक क्रांति की तरह सिद्धू ने क़दम रखे। जब आये थे तो मौक़ा ढूंढते थे मंचों पर यूँ खड़े रहते थे कि जैसे एक बार अगर गाने का मौक़ा दे दिया किसी ने तो उसके बाद तो सिर्फ़ सिद्धू की 'थापी' बजेगी। और हुआ भी यही। शुरुआती दौर में म्यूजिक कंपनियों के चक्कर लगाए और देखते ही देखते दो साल में दुनिया घुमा दी।

ख़ूब इल्ज़ाम भी लगे नाजायज़ हथियार रखने से लेकर चलाने तक और अपने गानों में गन कल्चर को प्रोमोट करने के। मगर फिर तर्क यह आता है कि गन कल्चर प्रोमोट कौन नहीं कर रहा है? वेब सीरीज की दुनिया भरी हुई है इन्हीं सब कंटेंट से। सिद्धू ने अपने किसी गाने में नशे की बात नहीं की। किसी ने सब बुराई देख ली किसी ने अच्छाई। मगर सिद्धू ने न बुराई की परवाह की और न अच्छाई की। जैसे वह तो किसी मिशन पर आया था। 

 

पंजाबी म्यूजिक इंडस्ट्री एक ढर्रे पर चलती आ रही थी और उस दुनिया को हिलाकर रख देने वाला इंसान था सिद्धू। देसी पंजाबी म्यूजिक और अमेरिकन म्यूजिक को आपस में जोड़ने वाली कड़ी था सिद्धू। पंजाबी म्यूजिक इंडस्ट्री को खेती किसानी से जोड़ने वाला इंसान था सिद्धू। पंजाबी कलाकार थोड़ी सी शोहरत मिलते ही विदेश जाकर बस जाते हैं मगर सिद्धू की विदेश में इतनी शोहरत होने के बावजूद वह अपने पिंड मूसा में ही रहा और उसी मानसा के पिंडों में फ़ना हो गया। सिद्धू को अपने खेत अपने ट्रैक्टर से जो लगाव था वह आख़िरी वक़्त तक रहा। सिद्धू का जनाज़ा उसी के ट्रैक्टर पर निकाला गया और उसी के खेत के एक हिस्से में सिद्धू को पंचतत्व के हवाले किया गया। 


"रहन्दी दुनिया तीकर सिद्धू दे नाम दे झंडे झूलदे रहने हन।"

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