हाउस हसबैंड
दुनिया के हर माँ-बाप की तरह कीर्ति के मम्मी पापा भी उस के लिए दुनिया का सब से बेहतरीन लड़का ढूँढ रहे थे हालाँकि वो इस बात से अनजान थे कि कीर्ति ने पहले ही तय कर लिया है कि उस के सपनों का राजकुमार कौन होगा।
सक्षम और कीर्ति कॉलेज में साथ पड़ते थे, प्यार हुआ, इज़हार हुआ, रिश्ता बना, साथ में कॉलेज ख़त्म किया, फिर आई जॉब की बारी। कीर्ति पढ़ाई में अच्छी थी, उस के लिए एक अच्छी जॉब पाना कोई बड़ी बात नहीं थी। लेकिम सक्षम इस का बिल्कुल उलट था, बहुत एवरेज सा लड़का, न पढ़ाई में ज़ियादा अच्छा न दुनियादारी में।
हालाँकि इस चीज़ का फ़र्क़ इनके रिश्ते पर कभी नहीं पड़ा, सक्षम के मुक़ाबले कीर्ति अच्छा कमा लेती थी । कीर्ति ने सक्षम को कभी ये बात जताई नहीं, हमेशा सक्षम के फैसलों की इज़्ज़त की।
वैसे तो सब कुछ अच्छा चल रहा था लेकिन दिक़्क़त तब आई जब कीर्ति के माँ-बाप ने उस के लिए रिश्ता देखने लगे । यूँ तो सक्षम बहुत सुलझा हुआ लड़का था लेकिन कीर्ति को ये डर था कि सक्षम कुछ कमाता नहीं है ये जानकर कहीं उस के घर वाले इस रिश्ते के लिए इनकार न कर दें।
एक दिन कीर्ति ने सक्षम को मिलने बुलाया और कहा -
कीर्ति: "सक्षम, घर वालों ने मेरे लिए रिश्ते देखने शुरू कर दिए हैं, और उनका कहना ठीक भी है, शादी की उम्र तो हो ही गयी है, ठीक-ठाक कमा भी लेती हूँ। अगर तुम कोई जॉब करलो तो मैं मेरे घर वालों से हमारे रिश्ते की बात कर सकती हूँ।"
सक्षम ने कीर्ति की बात सुन कर गहरी साँस ली और बोला
सक्षम: "कीर्ति देखो तुम जानती हो कि मैं तुम से कितना प्यार करता हूँ, और तुम्हारे साथ अपनी ज़िंदगी गुज़ारना चाहता हूँ। लेकिन मुझे जितनी प्यारी तुम हो मुझे उतने ही प्यारे मेरे उसूल भी हैं। तुम्हें पता है ना कि मैं शुरू से अपनी माँ की तरह बनना चाहता हूँ, एक हाउस हस्बैंड। और जब शादी करने के लिए लड़कियों का कमाना ज़रूरी नहीं है तो लड़कों का कमाना क्यों ज़रूरी है?"
कीर्ति : मैं तुम्हारी बात समझ रही हूँ, तुम सही कह रहे हो और मुझे तुम्हारे हाउस हस्बैंड बनने से कोई दिक्कत नहीं है लेकिन ये दुनिया ऐसे नहीं चलती है ना। मेरे माँ-बाप नहीं समझेंगे इस हॉउस हस्बैंड थियोरी को।
सक्षम : कोशिश तो कर के देखो।
कीर्ति : ठीक है मैं आज बात कर के देखती हूँ।
शाम को कीर्ति घर आकर बोलती है
कीर्ति: मम्मी, पापा मुझे आप से कुछ बात करनी है।
कीर्ति के माँ-बाप: हाँ बोलो ना बेटे
कीर्ति: "मैं एक लड़के से प्यार करती हूँ वो बहुत अच्छा है, मेरा बहुत ध्यान रखेगा, मैं चाहती हूँ आप दोनों उस से बस एक बार मिल लो।"
कीर्ति के माँ-बाप कहते हैं : "ठीक है बेटा। हम ने तुम्हें आज तक कभी मना किया है किसी चीज़ के लिए? हमें पूरा भरोसा है तुम्हारी पसंद पर, तुमने पसन्द किया है तो लड़का अच्छा ही होगा। वेसे लड़का करता क्या है? कमाता कितना है।"
कीर्ति : कुछ नहीं करता।
कीर्ति के माँ: कुछ नहीं करता मतलब?
कीर्ति: कुछ नहीं करता मतलब कुछ नहीं करता , शादी के बाद वो घर सम्भालेगा और मैं काम पर जाऊँगी। और उसे कमाने की ज़रूरत क्या है? मैं कमाती तो हूँ।
कीर्ति के पिता बोले : "घर पर रहेगा मतलब? क्या पागल हो गई है? लड़का घर कैसे सम्भाल सकता है?"
कीर्ति: क्यूँ जब लड़की घर सम्भाल सकती है तो लड़का क्यूँ नहीं?
कीर्ति के माँ: "अरे, लोग क्या कहेंगे, समाज थूकेगा हम पर। सौ बात की एक बात ये शादी नहीं हो सकती। अगर तुझे ये शादी करनी है तो समझ लेना तेरे माँ-बाप मर गए तेरे लिए।"
कीर्ति: आप लोगों ने ही सिखाया कि हमेशा ग़लत के खिलाफ आवाज़ उठाओ चाहे सामने अपने ही क्यूँ न हों और आज आप लोग ग़लत हैं। शादी तो मैं सक्षम से ही करूँगी।
यह कह कर कीर्ति अपने कमरे में चली गई, अपना सामान पैक किया और अपना घर छोड़ कर सक्षम के घर चली गई। कीर्ति बेल बजाती है सक्षम दरवाज़ा खोलता है तो देखता है कि कीर्ति हाथ मे बैग है। इससे पहले सक्षम कुछ पूछे कीर्ति बोलती है।
कीर्ति: मैंने अपना घर छोड़ दिया है। मुझे तुम से शादी करनी है। मेरे फैमिली में बस अब तुम हो और कोई नहीं।
ये कहते कहते कीर्ति रोने लगती है सक्षम उसे गले लगा कर चुप करवाता है और प्यार से पूछता है "क्या तुम सच में ये ही चाहती हो" कीर्ति हाँ में सर हिलाती देती है।
कुछ दिनों बाद दोनों शादी कर लेते हैं। और एक दूसरे शहर में रहने लगते हैं।
कीर्ति सुबह जब काम पर जाती , सक्षम टिफ़िन बना कर दे देता, कीर्ति के जाने के बाद घर की साफ़ सफ़ाई करता है, शाम को कीर्ति के आने से पहले उस का मनपसन्द खाना बनाता है कभी दोनों मूवी डेट पर जाते थे तो कभी कैंडल नाईट डिनर के लिए। सब कुछ बहुत अच्छा चल रहा था। 3 बसर कब निकल जाते हैं पता ही नहीं चलता। एक दिन ऑफ़िस जाने से पहले सक्षम ने कीर्ति से बोला।
सक्षम: यार मुझे कुछ रुपयों की ज़रूरत है, सोच रहा हूँ मैं भी अब कोई बिजनेस कर लूँ।
कीर्ति: ये अचानक से तुम्हें बिसनेस का भूत कैसे सवार हो गया, ख़ैर कितने रुपय चाहिए बताओ?
सक्षम: पचास लाख
कीर्ति: पचास लाख? मज़ाक कर रहे हो क्या? इतने रुपय नहीं है मेरे पास, वैसे भी मैं कमा तो रही हूँ ना फिर तुम्हें बिसनेस करने की क्या ज़रूरत है। घर पर रहो, आराम करो, घर संभालों।
सक्षम: लेकिन....
कीर्ति: देखो कोई पैसों का पेड़ नहीं लगा रखा मैंने की तुम जब जितने रुपए माँगों मैं तुम्हें ला कर दे दूँ। अभी मुझे देर हो रही है, शाम को आ कर बात करूँगी।
शाम को जब कीर्ति घर आई तो उसने अपने मेज़ पर एक ख़त रखा देखा। और जल्दी से उसे खोल के पढ़ने लगी।
ख़त सक्षम का था जिसमें लिखा था-
"कीर्ति मैं थक गया हूँ झूठा नाटक कर-कर के और तुम्हारा ध्यान रख-रख के, तुम हमेशा मुझ पर पैसों का रॉब जमाती हो और मुझे ये एहसास दिलाती हो कि मैं ज़िन्दगी में कुछ नहीं कर पाया। मैं इस रिश्ते से ख़ुश नहीं हूँ, मैं ये सब और नहीं सह सकता। मैं जा रहा हूँ तुम मुझे ढूंढने की कोशिश मत करना और हो सके तो मुआफ़ कर देना।"
ख़त पड़ के कीर्ति के पैरों तले ज़मीन खिसक जाती है, कीर्ति रोने लगी, सक्षम को कॉल किया, सक्षम के दोस्तों को कॉल किया लेकिन कहीं से कुछ पता नहीं चलता। कीर्ति को जब कुछ समझ नहीं आता, वो अपनी दोस्त तानिया को कॉल करके घर बुलाती है और रोते रोते सारी बात बताती है।
कीर्ति: मैंने हमेशा उस के फैसलों की इज़्ज़त की। कभी उसे ये नहीं बोला कि काम करो, पैसों कमाओ हर तरह से उसका ध्यान रखा उसके लिए अपने माँ-बाप को भी छोड़ दिया फिर भी उस ने ऐसा किया मेरे साथ।
तानिया: ख़ुद को संभाल कीर्ति। देख वो चला गया तो क्या हुआ, ज़िन्दगी ख़त्म नहीं हुई, तू इंडिपेंडेंट है अच्छा कमाती है , तुझे किसी की ज़रूरत नहीं है, ख़ुद को दूसरा मौक़ा तो दे। और मुझे तो हमेशा लगता था कि वो लड़का तेरे पैसों के पीछे है। तुझ से प्यार नहीं करता।
वक़्त बीता, कीर्ति ने जैसे तैसे ख़ुद को संभाल लिया और अकेले रहना सीख लिया। कीर्ति ने ख़ुद को काम मे इतना व्यस्त कर लिया कि उसे सक्षम की याद तक न आती।
अपनी मेहनत के दम पर कीर्ति पाँच सालों में एक बड़ी कंपनी की मैनेजिंग डायरेक्टर बन गई। एक दिन जब कीर्ति एक ओफ्फिशल पार्टी का इन्विटेशन जहाँ पर शहर के बड़े-बड़े डॉक्टर्स, इंजीनियर्स, बिसनेसमेंस आने वाले थे। कीर्ति भी उस पार्टी में गई। कुछ देर पार्टी अटेंड करने के बाद जब कीर्ति अपने घर जाने के लिए अपनी कार के पास पहुँची तो उसे पीछे से किसी ने आवाज़ लगाई।
जब कीर्ति ने पलट कर देखा तो सक्षम का बचपन का दोस्त रजत खड़ा था। रजत को देख कर कीर्ति को सक्षम की याद आ गई। वो थोड़ी रुआँसी सी हो गयी फिर ख़ुद को संभाला और रजत से पूछा।
कीर्ति: कैसे हैं रजत आप? पाँच साल बाद मिल रहे हैं।
रजत: मैं ठीक हूँ। सब से पहले तो आप को बहुत बहुत मुबारक हो, इतनी बड़ी कम्पनी की मैनेजिंग डायरेक्टर बन गईं आप।
कीर्ति: थैंक-यू रजत। किसी ने सच ही कहा है धोखा इंसान का सबसे बड़ा सबक होता है। अब मुझे ही देख लीजिए एक धोखेबाज़ इंसान के चक्कर में पड़ कर अपनी ज़िंदगी बर्बाद कर रही थी, वो तो मेरी ख़ुश-नसीबी है कि वो चला गया मेरी ज़िंदगी से तो देखिए आज मैं कितनी कामयाब हूँ।
रजत : कभी-कभी ज़रूरी नहीं कि जैसा हमें दिखे और जो हम सोचें वो ही सच हो कीर्ति।
कीर्ति: रजत प्लीज़ मुझे इस बारे में कोई बात नहीं करनी।
रजत : कीर्ति तुम जैसा सोच रही हो वैसा कुछ भी नहीं है। पाँच सालों से इस राज़ का बोझ अपने सीने पर ले कर चल रहा हूँ। आज तुम्हें ये बात नहीं बताई तो कभी ख़ुद से नज़रें नहीं मिला पाउँगा।
कीर्ति: राज़? कैसा राज़?
रजत : पाँच साल पहले सक्षम ने तुम ने 50 लाख रुपये माँगे थे?
कीर्ति: हाँ , उसे कोई फ़ालतू का बिज़निस करना था।
रजत: उसे कोई बिज़निस नहीं करना था, दरअसल सक्षम से तुम्हारे पापा ने ये कहा था के अगर वो अब भी तुम्हारी ज़िंदगी में रहा तो वो ख़ुद को कुछ कर लेंगे। और उन्होनें उसे कहा के वो तुम्हारी ज़िन्दगी से दूर हो जाए ।
कीर्ति (शक्की आवाज़ में) : अगर ऐसा था तो वो मुझे बता सकता था।
रजत : उस रात वो मेरे घर आया था बहुत परेशान था। वो ये बिल्कुल भी नहीं चाहता था के उसकी वज़ह से तुम्हें या तुम्हारे परिवार को कोई भी नुकसान हो , ऐसा होता तो वो ख़ुद को कभी मुआफ़ नहीं कर पाता।
कीर्ति (रोते हुए) : लेकिन उस ख़त का क्या?
रजत : वो ख़त सक्षम ने इसलिए लिखा था ताकि तुम उस से नफ़रत करो और तुम्हें उसे भुलाने में आसानी हो। जब मैं सक्षम से आख़िरी बार मिला था तब उस ने मुझ से वादा करवाया था कि मैं ये सब तुम्हें कभी न बताऊँ। मैं इतने सालों से इस वादे के बोझ को उठा कर चल रहा रहा लेकिन आज जब तुम्हें देखा तो ख़ुद को रोक नहीं पाया। मुझे भी सक्षम आख़िरी बार उस ही दिन मिला था जिस दिन उस ने घर छोड़ा था। उस के बाद वो कहाँ गया, कैसा है, ज़िंदा है भी या नहीं, कुछ नहीं पता।
यह बोल कर रजत वहाँ से चला गया और कीर्ति रोते-रोते चीखने लगी और ज़मीन पर गिर गयी।




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